देहरादून : चार दिवसीय छठ पर्व आज से नहाय-खाय के साथ शुरू हो रहा है। यह पर्व सूर्यदेव की आराधना और संतान के सुखी जीवन की कामना के लिए मनाया जाता है। 19 नवंबर को खरना होगा, जिसमें व्रती 36 घंटे निर्जला उपवास रखेंगे जो अगले दिन सूर्य को अर्घ्य देने के साथ संपन्न होगा। पूजा के लिए शहर के हरबंसवाला, टपकेश्वर, मालदेवता, रिस्पना, नत्थनपुर, प्रेमनगर समेत विभिन्न घाटों पर साफ-सफाई के बाद छठ मैया की प्रतिमा बनाई गई हैं।
बिहार,झारखंड के साथ पूर्व उत्तर प्रदेश में छठ पर्व का काफी महत्व है, लेकिन उत्तराखंड के कई शहरों में भी आयोजक समिति इस पर्व को भव्य रूप से करवाती हैं। लेकिन इस बार कोरोनाकाल के चलते समितियों ने आयोजन न करने का ऐलान किया है। साथ ही नागरिकों से सामूहिक पूजा के बजाय घर पर ही पूजा की अपील की है। ऐसे में अधिकांश छठ व्रत रखने वालों ने घर पर पूजा की तैयारी शुरू कर दी है। लोगों ने बाजार से टोकरी, सुप और पूजा का सामान खरीदना शुरू कर दिया है। इसके साथ ही नहाय-खाय के दिन लौकी और चने की दाल खाना शुभ माना गया है।
आचार्य विजेंद्र प्रसाद ममगाईं के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है, जो इस बार 20 नवंबर को पड़ रही है। हालांकि, इसका प्रारंभ चतुर्थी तिथि से शुरू हो जाता है। सुबह स्नान के बाद अन्न ग्रहण किया जाएगा। इस दिन लौकी और चने की दाल आहार के रूप में लेने की काफी महत्ता है।
कोरोना में घर पर पूजा की अपील
पूर्वा सांस्कृतिक मंच के महासचिव सुभाष झा ने बताया कि मंच दून में 18 घाटों पर पूजा आयोजन करवाता है, लेकिन इस बार कोरोना के चलते सभी से अपील की जा रही है कि घर पर ही पूजा कर पर्व मनाएं। बिहारी महासभा के के सचिव चंदन कुमार झा ने बताया कि आर्थिक रूप से कमजोर व्रतियों को वस्त्र, प्रसाद वितरित किया जाएगा।
ऐसे होगा पर्व का आयोजन
इस पर्व के पहले दिन नहाय खाय में घरों में पूजा के साथ छठ मैया के गीत और भजन होते हैं, दूसरे दिन 19 को खरना होगा, जिसमें छठ मैया की आराधना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखेंगी। 20 नवंबर को तीसरे दिन घाट किनारे जल में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा, जबकि 21 को चौथे और अंतिम दिन अघ्र्य देने के बाद व्रत खोलकर प्रसाद वितरित किया जाएगा।

